Tuesday, June 14, 2011

ग़लतफहमी

हर खूबसूरत वस्तु पुल्लिंग है यार
स्त्रियाँ तो बस हैं ग़लतफहमी का शिकार
हर भ्रमित वस्तु स्त्रीलिंग जरूरी है
जटिलता के बिना जिंदगी अधूरी है

नीला गगन हो या कल्कलाहता समंदर
सुगन्धित पुष्प हो या सघन जंगल
इन सभी से पौरुष प्रतिबिंबित है
स्त्रियाँ जहाँ वहां बुद्धिमत्ता सिमित है

कहते हैं हर सिद्ध पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ है
गौर करो मेरे दोस्त ध्यान दो
हाथ भी तो बेचारा एक पुरुष जात है
समस्या है स्त्रीलिंग और है पुल्लिंग समाधान
रह सकते सेकड़ो तीर एक तरकश मैं
परन्तु रहती न दो तलवारें कभी एक म्यान

इस लिए कहता हूँ मेरे दोस्त
हर खूबसूरत वस्तु पुल्लिंग है यार
स्त्रियाँ तो बस हैं ग़लतफहमी का शिकार
हर भ्रमित वस्तु स्त्रीलिंग जरूरी है
जटिलता के बिना जिंदगी अधूरी है


यह कविता एक हास्य रचना है
किन्तु विवाह एक अमोघ दुर्घटना है
विवाह से पहले सब रंगीन है
विवाह के पश्चात सब ग़मगीन है
शुरू शुरू सब लगता है सुहाना
अच्छा लगता है कल्पनाओ मैं गोते खाना
बाद लगता सब असहनीय संताप
ध्यान राहे मेरे दोस्त क्योंकि
स्त्रीलिंग है कल्पना और पुल्लिंग है यथार्थ

इस लिए कहता हूँ मेरे दोस्त
हर खूबसूरत वस्तु पुल्लिंग है यार

स्त्रियाँ तो बस हैं ग़लतफहमी का शिकार
हर भ्रमित वस्तु स्त्रीलिंग जरूरी है
जटिलता के बिना जिंदगी अधूरी है

द्वारा
प्रमोद कुक्साल



Monday, April 11, 2011

चलो चलें इन्ड्या गेट !!!

चलो चलें जंतर मंतर
चलो चलें इन्ड्या गेट
दूर भले हो कितना भी वो
मगर सभी से होगी भेँट
चलो चलें जंतर मंतर
चलो चलें इन्ड्या गेट


ऑफिस की भी छुट्टी हमको
टाइम पास की चिंता हमको
चाट खाके मौज मनाके
बकबक करके भरेगा पेट
चलो चलें जंतर मंतर
चलो चलें इन्ड्या गेट


अन्ना बोले जागो प्यारे
भ्रष्टाचार को त्यागो प्यारे
जगते जगते कुछ हैं लेट
चलो चलें जंतर मंतर
चलो चलें इन्ड्या गेट


दूषित हम भी दूषित तुम भी
तुम खाओ तो धंधा कला
हम खाएन तो सब कुछ शवेत
चलो चलें जंतर मंतर
चलो चलें इन्ड्या गेट


स्वच्छ करें पहले अंतरमन को
त्यागें तृष्णा निहित स्वार्थ को
विदा करें पारस्परिक मतभेद
तभी जाएँ जंतर मंतर
तभी जाएँ इन्ड्या गेट
तभी जाएँ जंतर मंतर
तभी जाएँ इन्ड्या गेट

प्रमोद कुक्साल